Slide background

Collective decision!!

and individual accountability

Nothing can change without knowledge.

Slide background

Let them grow!!!

Do not let the dream of hope to die...

We are the voice of voiceless.

Slide background

Childhood

How to grow without perspective?

You have a problem in hand

own it to solve it.

services

PVCHR

याचिका की आड़ में क्यों केवल उन्हीं के खिलाफ कार्यवाही की जा रही है?

Anti Torture Initiative, Basic Rights

विदित हो कि बलिराम सिंह क्षेत्र में काफी दबंग और मनबढ़ किस्म के व्यक्ति है, जिनका अपने क्षेत्र में काफी प्रभावभय व्याप्त हैशासन-प्रशासन में भी काफी पकड़ है तथा अवांछनीय तत्वों का बरद्धहस्त प्राप्त है। प्रार्थी दबंगों के विरूद्ध आये दिन मजलूमों के मामलों को लेकर लिखा-पढ़ीपैरवी करता रहता है। जिससे प्रार्थी को प्रबल आशंका है कि बलिराम सिंह द्वारा प्रार्थी के साथ भविष्य में कोई अप्रिय घटना कारित की जा सकती है या करायी जा सकती है। ऐसी स्थिति में प्रार्थी के जान-माल की सुरक्षा हेतु त्वरित न्यायोचित कानूनी कार्यवाही करते हुए प्रार्थी के जान-माल की सुरक्षा सुनिश्चित की जाय।

http://journalistcommunity.com/index.php?option=com_content&view=article&id=1845%3A2012-08-20-11-23-15&catid=34%3Aarticles&Itemid=54

याचिका की आड़ में क्यों केवल उन्हीं के खिलाफ कार्यवाही की जा रही है?

AddThis Social Bookmark Button

 

एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास

मानवाधिकार जननिगरानी समिति का महासचिव/अधिशासी निदेशक डा. लेनिन रघुवंशी चंदौली जिले के नौगांव तहसील के अंतर्गत विशेसरपुर (भरदुआ) गाँव में गरीबों, दलितों एवं आदिवासियों की बेदखली के खिलाफ राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को पत्र लिखकर इस सिलसिले में भूमाफिया की ओर से दायर जनहित याचिका के औचित्य पर सवाल खड़े करते हुए पूछा है कि इस याचिका की आड़ में क्यों केवल अनुसूचित जातिअनुसूचित जनजाति के खिलाफ कार्यवाही की जा रही है ? डा. लेनिन रघुवंशी एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं और उनके मानवाधिकार के क्षेत्र में किये गये कार्य को देखते हुए दक्षिण कोरिया से 2007 ग्वान्जू एवार्ड, ह्यूमन राइट्स 2008 आचा पीस स्टार अवार्ड (यू.ए.ए.) व 2010 वाइमर अन्तर्राष्ट्रीय मानवाधिकार पुरस्कार (जर्मनी) जनमित्र गाँव की परिकल्पना के लिए वांशिगटन स्थित अशोका फाउण्डेशन ने ''अशोका फेलोशिप'' प्रदान किया।

तुम मुझे कैद कर सकते हो,जुल्म ढा सकते हो मुझ पर बेइंतहा, खत्म कर सकते हो मेरे शरीर को , पर तुम मेरे दिमाग को कैद नहीं कर सकते, हरगिज नहीं!

नवदलित आंदोलन के तहत अस्पृश्यता खत्म करने, मानवाधिकार बहाल करने और जुल्मोसितम के खिलाफ प्रतिरोध के तहत इस महीने के 12 और 13 तारीख को पीवीसीआर के राष्ट्रीय विमर्श के दौरान लिये गये इस संकल्प की गूंज अभी देश विदेश में पैलने लगी है। डा. लेनिन रघुवंशी और मानवाधिकार जननिगरानी समिति के उनके जुझारु साथियों की पहल पर नई दिल्ली में आयोजित दो दिवसीय विमर्श को सामाजिक समता की दिशा में सामाजिक अन्याय और अत्याचार के विरुद्ध व्यापक गोलबंदी की कारगर पहल के रुप में देखा जा रहा है। 

मानवाधिकार जन निगरानी समिति भी आदिवासियों,दलितों की बेदखली के खिलाफ लड़ाई में लामबंद! वनाधिकार अधिनियम २००६ के तहत जल जंगल और जमीन के हक हकूक की हिफाजत का दावा किया जाता है, लेकिन हो इसका उलट रहा है। देश को आज़ादी मिलने के साठ साल बाद 2006 में वनाश्रित समुदाय के अधिकारों को मान्यता देने के लिए एक क़ानून पारित किया गया, अनुसूचित जनजाति एवं अन्य परंपरागत निवासी (वनाधिकारों को मान्यता) क़ानून। यह क़ानून केवल वनाश्रित समुदाय के अधिकारों को ही मान्यता देने का नहीं, बल्कि देश के जंगलों एवं पर्यावरण को बचाने के लिए वनाश्रित समुदाय के योगदान को भी मान्यता देने का क़ानून है। जंगलात महकमा हमेशा की तरह जंगल से जुड़े जनसमूह के खिलाफ दमनकारी रवैया अपनाता है और कानून की धज्जियां उड़ाते हुए बेदखली का ​​सिलसिला जारी है।सरकार वनक्षेत्र में रहने वाले आदिवासियों के अरण्य पर अधिकार को अस्वीकार नहीं करती और वनों से उनके आजीविका कमाने के धिकार को स्वीकार करने के सबूत बतौर वनाधिकार अधिनियम लागू करने का हवाला देती है। लेकिन आदिवासियों के लिए संविधान में प्रदत्त पांचवी​​ और छठीं अनुसूचियों के खुला उल्लंघन की पृष्ठभूमि में वानाधिकार का मसला मखौल बन गया है। देशभर में यही किस्सा चालू है। वनों के विनाश के विरुद्ध पर्यावरण आंदोलन और वनों व प्राकृतिक संसाधनों पर जनता के हक हकूक के आंदोलन की वजह से उत्तराखंड राज्य का गठन हुआ, पर वहां आजतक वनाधिकार अधिनियम लागू नहीं हुआ। झारखंड और छत्तीसगढ़ जैसे आदिवासी बहुल राज्यों की .ही कथा है। वनों से बेदखली के लिए छत्तीसगढ़ में बारकायदा सलवा जुड़ुम चल रहा है, तो बाकी राज्यों के ादिवासीबहुल इलाकों में भी घोषित तौर पर नामांतर से सलवा जुड़ुम जारी है। पूर्वोत्तर और ​​कश्मीर में तो विशेष सैन्य अधिकार कानून के तहत आम जनता के नागरिक और मानवाधिकार तक निलंबित है। पर उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में भी ​आदिवासियों के खिलाफ पुलिस प्रशासन का रवैया विशेष सैन्य अधिकार कानून जैसा ही है। चंदौली जिले के नौगढ़ के वनक्षेत्र में रहने वाले ​​आदिवासियों की बेदखली इसका जीता जागता सबूत है।सरकार की करनी और कथनी में जमीन आसमान का पर्क नजर आ रहा है।वन विभाग वनाधिकार कानून की धज्जियां उड़ाते हुए आदिवासियों की बेदखली कर रहा है। 65 वीं स्वतंत्रता जयंती की पूर्व संध्या पर नौगढ़ में इसके खिलाफ मजदूर किसान मोरचा ने दरना दिया, जिसमें दूसरे सामाजिक संगठनों की भागेदारी बी रही। खास बात यह है कि नवदलित आंदोलन चला रही मानवाधिकार जन निगरानी समिति, पीवीसीआर आदिवासियों के जल जंगल जमीन के हक हकूक की इस लड़ाई में लामबंद है। धरने के जरिये इन संगठनों ने चेतावनी दी है कि आदिवासियों की बेदखली की हर कोशिश का मुंहतोड़ जवाब दिया जाएगा। धरने में आसपास के गांवों के हजारों लोग शामिल हुए।

उत्तर प्रदेश सरकार एक ओर वनाधिकार क़ानून के क्रियान्वयन को अपना राजनीतिक एजेंडा मानकर तरह-तरह के आदेश-निर्देश जारी कर रही है, वहीं दूसरी ओर स्थानीय प्रशासन, पुलिस और वन विभाग सरकार की मंशा पर पलीता लगाने पर तुले हुए हैं. उत्तराखंड में भी इस क़ानून के क्रियान्वयन की प्रक्रिया बाधित की जा रही है।वनाधिकार कानून, 2005 को पारित करते समय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने माना था कि आजादी के बाद के छह दशकों तक आदिवासियों के साथ अन्याय होता रहा है और इस कानून के बाद उन्हें न्याय मिल पाएगा। गौरतलब है कि आजादी के 65 वर्ष बाद चन्दौली जिले का नौगढ़ ब्लाक आज भी गुलाम है संविधान में सभी नागरिकों को समान रुप से जीने का अधिकार दिया गया है लेकिन नौगढ़ में आज भी दोयम दर्जे की स्थिति बरकरार है। वनाधिकार कानून को लागू करते हुए सरकार ने कहा था कि जंगल पर निर्भर लोगों के साथ लम्बे समय से नाइंसाफी हो रही हैं जिसकों कम करने के लिए वनाधिकार अधिनियम 2006 को लागू किया गया परन्तु वनाधिकार अधिनियम 2006, लम्बे संघर्ष के बाद 2009 में चन्दौली जिले में लागू किया गया।

चन्दौली जिला में उन्हीं लोगों को जमीन से बेदखल किया जा रहा हैं, जिनके पास वन भूमि के अलावा जीने व रहने के लिए कोई घर नहीं है, कोई आधार नहीं हैं, जो पूरी तरह वन पर आश्रित है।वनविभाग द्वारा लगातार उनके घरों को उजाड़ने की प्रक्रिया चल रही हैं। दूसरी तरफ बड़े कस्तकार या भू माफिया हैं, जिनके पास 400 से लेकर 500 एकड़ तक की जमीन हैं और वह भी वन भूमि में काबिज है। उनके घरों को या फसलों को उजाड़ने के लिए वन विभाग द्वारा कोई अभियान या पहल नहीं किया जा रहा है। वहीं वन विभाग लगातार दलितों व आदिवासियों को उजाड़ने हेतु पुलिस फोर्स का सहारा लेता हैं तथा घर की बहू बेटियों के उपर शारीरिक व मानसिक अत्याचार किया जाता हैं।

चन्दौंली जिले के नौगढ़ विकास खण्ड में 29 जून को जयमोहनी रेन्ज के अधिकारियों, पुलिस व वनकर्मीयों द्वारा ग्राम -भरदुआ, पोस्ट-समसेरपुर के दलितों की बस्तियों को दिन के 12 बजे उजाडा गया। वन विभाग के अधिकारीयों व कर्मचारियों ने (वनवासी) दलितों के घर जे.सी.बी. लगाकर गिरा दिये। जिस समय यह घर गिराने का कार्य चल रहा था, उस समय अधिकांश पुरुष मजदूरी करने के लिए बाहर गये हुए थे। गॉव में केवल कुछ महिलाएं ही थी। घर गिराने के साथ-साथ ही घरों में रखे हुए अनाज के बर्तनों को तोड दिया गया, जिसके कारण अनाज मिटी में मिल गया, विरोध करने वाले लोगों को गन्दी-गन्दी गालिया दी गयी, साथ ही उनको मारा पीटा गया। इनमें 35 लोग घायल हुये है।


डा. लेनिन का पत्र इस प्रकार है:

सेवा में,

श्री खाजा ए. हफीज,

सहायक निबंधक,

राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग,

नई दिल्ली।

विषय: वाद संख्या 28923/24/19/2011/ MI के सम्बन्ध में।

महोदय,

मेरे शिकायत पत्र दिनांकित 13 जुलाई, 2011 पर विशेष सचिव, उत्तर प्रदेश शासन की आख्या पर मेरा कथन निम्नवत् है:- 

माननीय उच्च न्यायालय इलाहाबाद में जनहित याचिक संख्या 2722/2002-बलिराम सिंह बनाम उत्तर प्रदेश सरकार दाखिल करके उसकी आड़ में कई पीढि़यों से बसे आदिवासियों व दलितों को उजाड़ा जा रहा हैं। विदित है कि श्री बलिराम सिंह उर्फ श्री गोविन्द सिंह एक दबंग व्यक्ति है और वन विभाग की जमीन कब्जा करके बोझ गाँव में श्री लालता बियार के द्वारा खेती करा रहे हैं। श्री गोविन्द सिंह के कारण ही अन्र्तविरोध बढ़ने से इस इलाके में माओवादियों का पहल बढ़ा। कानून का राज स्थापित होने इंटिजेन्स एजेन्सी व राज्य सरकार के उत्कृष्ट कार्य से हिंसा पर आधारित माओवादी आंदोलन को समाप्त किया जा सका हैं। अब पुनः वन विभाग व श्री गोविन्द सिंह अन्र्तविरोधों को बढ़ाकर ‘‘कानून के राज’’ को चुनौती खड़ाकर रहे हैं। अभी हाल में 29 जून, 2012 को नौगढ़, चंदौली, उ.प्र. के विशेसरपुर (भरदुआ) गाँव में गरीबों, दलितों एवं आदिवासियों के घरों को वन विभाग ने पुलिस की मदद से तोड़ दिया। महिलाओं के साथ अभद्र व्यवहार किया। 

Please login to comment
Don't have an account? Register here

Username:

Password:

Remember me:


 

Child Hood

How to grow up without perspective ??

Key Achievement

The work of PVCHR was awarded with the Gwangju Human Rights Award 2007, ACHA Star Peace Award 2008 and 2010 Human rights prize of the city of Weimar in 2010 and Usmania Award from Madarsa Usmania, Bazardiha for the development and welfare of education.

read more

Basic Rights

Basic rights for marginalized groups in the Indian society, e.g. children, women, Dalits and tribes and to create a human rights culture based on democratic values. PVCHR ideology is inspired by the father of the Dalit movement, Dr. B.R. Ambedkar.

read more

Indian Society

Indians society, especially in the rural areas, is still influenced by feudalism and the caste system which continues to determine the political, social, and economic life of the country. Caste based discrimination is practiced in the educational system...

read more

How we work!!!

Fighting caste discrimination
The life narratives, voices, and actual experiences on this website reflect the spiritual awakenings of personalities extraordinaire who desired to make a difference in the lives of others. The passion for social justice and meaningful activities, the dedication to compassion, the commitment and healing journeys of those ordinary individuals and their stirring stories is what we intend to showcase.

PVCHR founded in 1996 by Mr. Lenin Raghuvanshi and Ms. Shruti Nagvanshi in close association with Sarod Mastro Pandit Vikash Maharaj, Poet - Gyanendra Pati and Historian Mahendra Pratap. PATRON: Justice Z.M Yacoob Sitting Judge Constitution Court of South Africa & Chancellor of University of Durban, South Africa.